(530) 550-2510

शत्रु सीमा लांग चुका है, हर सब्र का टूट अब बाँध चुका है,
लहू बहा है, जान गईं है, घाटी बन शमशान गयी है,
दुश्मन भर हुंकार रहा है, जो बोले थे कर पाओगे?

तुम चार सिर कब लाओगे, तुम चार सिर कब लाओगे?

अभिमान समझ तुम चुने गए थे, हर रात -पहर तुम सुने गए थे,
हल्ला बहोत मचाये थे तुम, इलज़ाम बहोत लगाये थे तुम,
जब करने बारी आई, तुम फिर “डीलिंग” दे जाओगे?

तुम चार सिर कब लाओगे, तुम चार सिर कब लाओगे?

समय है काम और बहुत है, तुमसे जन का ये आव्हान “बहुत” है,
करे पे पानी फेर न देना, ए “व्यापारी ” घर बेच न देना,
विकास करो जो  दिखाई दे, या बस मॉडल- मॉडल चिल्लाओगे?

तुम चार सिर कब लाओगे, तुम चार सिर कब लाओगे?

415-417-3722

बड़ी बेदर्द दुनिया है, बड़ा ज़ालिम ज़माना है,
न मैडम ने ये समझा था, न साहब ने ये जाना है,
लगेगी भूख ऐ अहमक, तो अंतड़ी आग उगलेगी,
ये कातिल पेट तेरा है, तुझे ये खुद पलाना है.

किसी ने भीख बांटी थी, किसी ने जोश बांटा है,
जो तू है होश का दरकर, तुझे कब होश बांटा है?
ये तेरा नून रोटी में, तेरा ही पसीना है.
तेरे खून का सालन, महफ़िल खूब बांटा है.

जो गर दाम हो मुट्ठी, सियासत जेब में तेरे,
न हिन्दू के ही अपने हैं, न मुस्लिम और ये तेरे,
सवाली खून के हैं ये, और ये लेकर ही मानेंगे,
न हम कल जान पाये थे, न आगे हम ये जानेंगे।

6305132960

कुछ कह रही है हवा रोज की तरह,
कहीं किसी कोने में फ़िर याद सी जागी है.

तेरा साथ न होने का कोई गिला नहीं,
पर तेरी दूरी का एहसास अभी बाकी है.

तुम भी देखते हो छिप-छिप कर, छिपाता नहीं है परदा,
सिलवटें कह रही हैं, इस बार तू झांकी है.

दिख जाते हो तुम, फ़िर हो जाते हो गुम,
पर रात कह रही है कुछ बात अभी बाकी है.

कुछ न बोलोगे तुम, सब जान जाऊँगा मैं,
खामोशी कह रही है, अल्फास अभी बाकी है.

झूठ कहती है दुनिया कि मुझे मौत आ गयी है, मैं जानता हूँ मैं जिंदा हूँ,
क्यों के तेरे सीने में कुछ साँस अभी बाकी है.

रो-रो के दुपट्टे को भिगोता क्यूँ है?

मैं तो आखिरी ख़त भी वहीं छोड़ आया था,
फिर ये कत्ल का इल्जाम मुझ पे लगा क्यूँ है.

आवाजें तो दफ्न हो गईं थी सब उस दिन,
गली के आखिर में फिर ये शराबा क्यूँ है.

सो गयी रात, ताउम्र, सुन कर वो आखिरी हरफ,
बेशर्म चाँद आज फिर निकला क्यूँ है.

दुहाई को रिश्तों की कीमत अदा तो कर दी थी पूरी,
सारा शहर फिर तिजारत पे निकला क्यूँ है.

वो कहता है की बाकी नहीं है याद कोई सीने में,
फिर रो-रो के दुपट्टे को भिगोता क्यूँ है.

मैं मरकर हर बार लिखूंगा

अगर यूँ ही कुछ लिखने को न मिला तो क्या ये कलम दम तोड़ देगी,
मैं शायर हूँ, कहीं-कहीं से, कुछ ढूंढ-ढूंढ कर लाऊँगा,
चिलमन कोई जला दूंगा, बीडी कोई बुझाऊँगा,

कुछ सिमटी रातें तह करके, रख दूंगा अलमारी में
सारी बारिश सुखा-सुखा कर, सागर तुझे डुबा दूंगा.

बंद करूंगा सूरज तुझको सात कड़ी के तालों में,
चाँद तुम्हारे रेशे ले कर खद्दर नयी बनाऊंगा.

प्रेम लिखूंगा वार लिखूंगा, अर्दप अत्याचार लिखूंगा,
फूलों से खुशबू ले लूँगा, काँटों पर बलिहार लिखूंगा.

खंडहरों में जमा के महफिल, शीश महल-यलगार लिखूंगा.
लैला से शोखी ले लूँगा, मजनू को व्यापार लिखूंगा.

चारू-चन्द्र की तिरपन किरणे, छीन भरूँगा डिबिया में.
सरहद को बंदी कर दूंगा, फिर उस पर उस पार लिखूंगा.

घर चौबारे एक करूंगा, को सूरज मद्धम कर दूंगा,
जहाँ-जहाँ पर भीड़ लगेगी, सबको निर्जन थार लिखूंगा.

तरुवर को फलहीन करूंगा, सरवर होंगे रक्त-पिपासु,
दो तलवारें एक म्यान में, एक नहीं सौ बार लिखूंगा.

एक अकेली मछली, सब तालाबों को साफ करेगी,
निरीह चने को साथ बिठाकर, फूटे सारे भाड़ लिखूंगा.

राजा के जालिम प्रहरी को, जीवन-मित्र बना दूंगा,
ओ लटके फाँसी के फंदे, तुझको विजयी हार लिखूंगा.

मृत्यु को जीवन गीत बताकर, घुल कर हवा में बह जाऊँगा,
मुझ पर जितने वार करोगे, मैं मरकर हर बार लिखूंगा.

मेरे घर की टूटी खिड़की से

मेरे घर की टूटी खिड़की से, कुछ-कुछ धूप भी आती है कुछ-कुछ छाँव भी आती है.
अब तक वो शहरों में गुम थी, घने चार पहरों में गुम थी,
वो उजली सी, वो बिजली सी, सीमित वन में नहीं कदाचित,
मेरे गाँव भी आती है.
मेरे घर की टूटी खिड़की से, कुछ-कुछ धूप भी आती है कुछ-कुछ छाँव भी आती है.

हो मंगल का मेला, या जुमेरात की रात कव्वाली,
सीपी-शंख की मेलें छन-छन, झांझर-झुमके, बुर्के वाली.
क्रंदन कोलाहल बच्चों का, समझ सयानी शर्म की लाली.
चपल भागती कभी सरापट, झिझकी कभी, कभी कदाचित,
दबे पाँव भी आती है,
मेरे घर की टूटी खिड़की से, कुछ-कुछ धूप भी आती है कुछ-कुछ छाँव भी आती है.

गिरजाघर के घंटे टन-टन, जगराते की रात का मजमा,
भजन कीर्तन ढपली ढोलक, साखी सबद रमैनी अबतक,
कभी जगद-आरती जगदम्बा की, कभी अफ्तारी का घोष कदाचित, कभी
भोर अज़ान भी आती है.
मेरे घर की टूटी खिड़की से, कुछ-कुछ धूप भी आती है कुछ-कुछ छाँव भी आती है.

होने तक

किसी ने ज़ुल्फ़ को शाम कहा, किसी ने आँखों को समंदर,
मैं तुझको तुम ही लिख न सका, ये कलम फ़ना होने तक.

शिकायत चोर ने ज़ाहिर से की, सिपाही ने कोतवाल से,
वो मुझपे इलज़ाम ही लगाते रहे, फैसला होने तक.

शाम फिर दिन ढले ही आई, डाक-घर की बत्तियां भी जलीं,
मैं कुरेद कर ज़ख्म ही सुखाता रहा, सुबह होने तक.

जन्नत में सवाल बहुत हैं, दोज़ख में जगह कम है,
मुझे सलीब* पर ही रहने दो, आसरा होने तक.

बीमार इस लाइलाज

निशानात पांवों के दो दर्ज हैं,
सहरा में अकेले हम ही हम नहीं.

हवाएं औसत से ज्याद गर्म हैं,
ये आहें हमारी अकेले नहीं.

बात तुम खूब कहते थे, कहते हो, कहते रहोगे,
चुप रहना यूँ हमारी भी फितरत नहीं.

न ओढ़न, न बालों, न पैरहन का सलीका,
सामाँ हमारे भी बिखरे कम नहीं.

ये छुप के रो लिए, वो मुंह धो के सो सो लिए,
पलकें हमारी भी कुछ कम नम नहीं.

हकीकत में ही जिला सकता तो तसवीरें बनाता क्यों खुदा,
खरीदार ख्वाबों के भी कुछ कम नहीं.

नज़्म लिखते हम हैं, पढ़ते तुम हो, बिकने दूर तक जाती हैं,
बीमार इस लाइलाज के फ़क़त एक हम नहीं.

910-843-6873

ज़हर की दुकान पे जो भीड़ लगी देखी,
सोचा मैंने कौन हैं ये लोग अविवेकी,

अरे! एक, न ही दो, न ही तीन, न ही चार,
भीड़ थी कि भीड़ थी कि कई सौ हज़ार,

हर आदमी था खुश, करता था आगे पुश,
देख के इतना रश, मैं तो खा गया था गश.

मैंने पूछा “क्या सामूहिक आत्महत्या का है अरमान?”
या फिर देख के आये हो तुम लोग “तीस मार खान”?

वो बोले नहीं, आलू, प्याज, नमक के बाद अब ज़हर की है बारी.
क्योंकि मरने को मांगेगी जनता सारी.
कहीं न शुरू हो जाये इसकी भी कालाबाजारी,
इसलिए करते हैं एडवांस में खरीदारी.

आधुनिक मुहावरे एवं लोकोक्तियाँ

स्कूल के दौरान इससे मज़ेदार और स्रजनात्मक लेखन प्रश्नोत्तरों के दौरान शायद ही किसी ने किसी ने किये हों. हमारी (इसे कुछ लोग मेरी भी कहते हैं, लेकिन हम लखनऊवासी ‘मैं’ को ‘मैं’ नहीं ‘हम’ कहते हैं क्योंकि हम कभी अकेले नहीं चलते, जहाँ चलते हैं चार लड़के दायें बाएँ हमेशा रहते हैं.) हिंदी की अध्यापिका महोदया हमेशा हमसे इसीलिए परेशान रहीं. कभी हम इस प्रश्न का उत्तर खाली छोड़ के नहीं आये. एक वाक्य बोलिन तौ दुई लिखेन की एक तौ सही हुइबे करिहै. एक बार तो उन्होंने हद्द ही कर दी. प्रश्न में सिर्फ वाक्य प्रयोग करने को बोला अर्थ लिखने को नहीं. हम बड़े खुश … पढ़ लो ये रायता फैलाये थे हम.

सिट्टी-पिट्टी गुम हो जाना:  मेरी सिट्टी-पिट्टी बहुत दिनों से गुम है, मिलती ही नहीं.
असमान फट पड़ना:         मेरा असमान बहुत दिनों से फटा पड़ा है. कृपया उसे जोड़ दें.

अब इस पर नंबर तो मिले नहीं. हाँ लेकिन सबके सामने बुला के वाह-वाही खूब मिली, और क्लास से तीन दिन की छुट्टी भी. खैर अब इतिहास के पन्नों से दूर निकल कर आज के वास्तविक मुद्दे पर आते हैं. आज का टॉपिक है – आधुनिक मुहावरे एवं लोकोक्तियाँ
वैसे इस टॉपिक पर अधिक प्रकाश डालने से पहले ये ज़रूरी है की मैं आप लोगों को मुहावरों और लोकोक्तियों (कहावतों) में अंतर बता दूं. (मुझे पूर्ण विश्वास है की जब इस प्रश्न के उत्तर में नंबर मिलने का समय रहा होगा तो आपने भी नहीं पढ़ा होगा)
मुहावरों का स्वयं में कोई अर्थ नहीं होता, अर्थात वे अपूर्ण वाक्य होते हैं, बहुधा उनमे क्रिया नहीं होती और जब तक वे वाक्य में प्रयुक्त न हों उनका कोई अर्थ नहीं होता. जैसे – अंधे की लाठी, आँख का तारा आदि-इत्यादि.
(अब जा के हमे समझ आया, ये मैडम की चाल थी हमसे वाक्य प्रयोग करवाने की, अगर नहीं करते तो पड़े रहते बेकार उनके मुहावरे)

वहीँ दूसरी ओर कहावतें या लोकोक्तियाँ अपने आप में पूर्ण वाक्य होते हैं और उनका पूर्ण अर्थ भी होता है. जैसे – न नौ मन तेल होगा, न राधा नाचेगी.

देखो सब तो कह दिया यहाँ. कुछ नहीं छोड़ा, नौ मन तेल लाओ राधा नचाओ, मुन्नी नचाओ, शीला नचाओ… बट प्लीज़ मैम ये तो बता दीजिये कौन सा आयल लाना है लाइक क्रूड-ऑयल, केरोसीन etc. like राधा को करना क्या था? खाना बनाना था? स्कूटी में डालना था? इन्फोर्मशन पूरी नहीं है. question rejected…

चलिए अब मुख्य मुद्दे पर आते हैं…आधुनिक मुहावरे और लोकोक्तियाँ. ये वो मुहावरे और लोकोक्तियाँ हैं जिनका या तो पाठ्य पुस्तकों में उल्लेख नहीं मिलता, या वे हिंदी भाषा के अन्य भाषाओँ से ‘in a relationship’ status नतीजा हैं.
लेकिन कालांतर में अब ये जन सामान्य के दैनिक भाष्य का अटूट अंग बन चुके हैं (गज़ब हिंदी लिख दिए हो त्रिवेदी जी, समझ आ रही है..?)

१. वाट लगाना:
२. लग लेना
३. ले लेना
४. झंड हो जाना
५. रायता फैलना
६. डंडा हो जाना
७. सेट्टिंग हो जाना
८. केला काटना
९. चिंटू बनाना
१० के.एल.पी.डी. हो जाना

अब आप का होमवर्क ये है की आप इनका अर्थ लिख कर वाक्य प्रयोग करें और हम नंबर देंगे …